International Advance Journal of Engineering,Science & Management

ISSN: 2393-8048

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    अधिकार-आधारित' से 'प्रोत्साहन-आधारित' कल्याण: भारत की सामाजिक क्षेत्र नीतियों में एक बड़ा बदलाव (2014-अब तक)
    डॉ. अभिषेक यादव, पीएचडी, राजनीति विज्ञान विभाग, दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर 
     Page No.: |  Year: 2025|  Vol.: 24|  Issue: SpecialEdition
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    भारत में 'कल्याणकारी राज्य' (Welfare State) की अवधारणा संवैधानिक रूप से नीति निर्देशक तत्वों में निहित है, जिसका मुख्य उद्देश्य सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करना है। स्वतंत्रता के पश्चात से ही भारत की सामाजिक सुरक्षा नीतियां विभिन्न चरणों से गुजरी हैं। हालाँकि, पिछले दो दशकों में भारत के कल्याणकारी दर्शन (Welfare Philosophy) में एक स्पष्ट और गहरा विभाजन देखा जा सकता है। वर्ष 2004 से 2014 के कालखंड को 'अधिकार-आधारित' (Rights-based) युग के रूप में पहचाना जाता है, जिसमें नागरिक को राज्य के विरुद्ध कानूनी रूप से सशक्त बनाने हेतु 'हकदारी' (Entitlement) का ढांचा तैयार किया गया। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA), शिक्षा का अधिकार (RTE) और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) इसके प्रमुख उदाहरण थे। वर्ष 2014 के बाद, भारतीय नीति-निर्माण के परिदृश्य में एक व्यापक 'प्रतिमान विस्थापन' (Paradigm Shift) देखा गया है। वर्तमान सरकार का दृष्टिकोण 'कानूनी अधिकार' देने के बजाय 'सेवा वितरण की दक्षता' (Efficiency in Service Delivery), 'ठोस परिसंपत्ति निर्माण' (Tangible Asset Creation) और 'प्रोत्साहन' (Incentives) पर अधिक केंद्रित हो गया है। अर्थशास्त्रियों ने इस नए दृष्टिकोण को 'न्यू वेलफेयरिज्म' (New Welfareism) की संज्ञा दी है। यह नया मॉडल केवल सब्सिडी या कानूनी गारंटी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह तकनीक (JAM ट्रिनिटी - जनधन, आधार, मोबाइल) के माध्यम से बिचौलियों को समाप्त करने और सीधे लाभार्थी के जीवन की गुणवत्ता (Ease of Living) में सुधार करने पर जोर देता है। जहाँ पूर्ववर्ती मॉडल 'मांग-आधारित' (Demand-driven) था, वहीं वर्तमान मॉडल 'आपूर्ति-दक्षता' (Supply-side Efficiency) और 'व्यवहार परिवर्तन' (Behavioral Change) को प्राथमिकता देता है। स्वच्छ भारत अभियान के तहत शौचालयों का निर्माण, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के माध्यम से गैस कनेक्शन और आयुष्मान भारत के तहत स्वास्थ्य बीमा इसके ज्वलंत उदाहरण हैं, जहाँ सरकार लाभार्थी को एक 'सक्रिय भागीदार' के रूप में देखती है। प्रस्तुत शोध पत्र का उद्देश्य इस वैचारिक और प्रशासनिक परिवर्तन का आलोचनात्मक विश्लेषण करना है। यह शोध इस प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास करता है कि क्या 'अधिकार' से 'प्रोत्साहन' की ओर यह झुकाव नागरिकों की दीर्घकालिक सुरक्षा को मजबूत करता है और भारतीय लोकतंत्र में 'लाभार्थी' वर्ग के उदय के क्या सामाजिक-राजनीतिक निहितार्थ हैं। यह पत्र विभिन्न योजनाओं के तुलनात्मक अध्ययन के माध्यम से यह समझने का प्रयास करेगा कि आधुनिक भारत में सामाजिक सुरक्षा की परिभाषा किस प्रकार पुनः लिखी जा रही है।